Saturday, 9 September 2017

अष्टधातु दरवाजा

 

अलाउद्दीन खिजली ने जब चित्तोड़ की महारानी पद्मनी को देखा,तो वह उन पर मोहित हो गया और उन्हें हासिल करने के लिए उसने चित्तोड़ पर हमला कर दिया। परंतु महारानी पद्मनी ने 25 अगस्त 1303 अपनी दासियो के साथ जोहर कर लिया। जब अलाउद्दीन विजय प्राप्त करके महल में आया तो उसे मिली सिर्फ राख। इसके बाद गुस्से में आग-बबूला अलाउद्दीन ने मेवाड़ के इलाके में मार-काट व लूट-पाट मचा दी।
इसी दौरान वह चित्तौड़ग़ढ़ किले से बेशकीमती अष्टधातु गेट उखाड़ कर ले गया,और दिल्ली के किले में ले-जाकर लगा दिया।
भरतपुर किले में लगा हुआ अष्टधातु गेट सुरक्षा जाली सहित 

इतिहासकारो के अनुसार सन 1765 में भरतपुर के महाराज जवाहर सिंह ने अपने पिता महाराज सूरजमल की मृत्यु का बदला लेने के लिए दिल्ली के शासक नजीबुद्दौला पर आक्रमण कर दिया। जब उन्हें चित्तोड़ के अपमान व गेट के बारे में जानकारी हुई,तो वे अष्टधातु का दरवाजा भी उखाड़कर अपने साथ भरतपुर ले आये।वहाँ से उन्होंने चित्तौड़ सन्देश भेजा कि चाहे तो वे अपनी अपनी राजपूती शान के प्रतीक दरवाजे को ले जा सकते है।  परंतु वहाँ से इसे कोई लेने नहीं आया। तो उन्होंने यह दरवाजा भरतपुर किले के उत्तरी भाग में लगवा दिया । 
ये दरवाजा आज भी वीरो की बहादुरी व जिंदादिली की दासता वयाँ कर रहा है । 



20 टन भारी है अष्टधातु दरवाजा 
यह दरवाजा करीब 20 टन वजन का है। इसमे करीब छः टन की मात्रा में अष्टधातु लगी हुई है चूँकि अष्टधातु में सोना भी शामिल होता है। इसलिए इसकी सुरक्षा के लिए पुरातत्व विभाग ने लोहे की सुरक्षा जाली लगा रखी है। 


क्या है अष्टधातु 
अष्टधातु आठ धातुओ का संप्रदाय है यह हीरों से भी महँगी है। 
प्राचीन ग्रंथो के अनुसार-
स्वर्ण रूप्यं ताम्रं  रंग यशदमेव च।
शीसं लौहं रसश्चेति धातवोऽष्टौ प्रकीर्तिता: 
अर्थात 
जिसमे सोना,चाँदी,तांबा,राँगा,जस्ता,सीसा,लोहा तथा पारा होता है,अष्टधातु कहलाता है। 
सोना मिले होने के कारण इसका रंग काला नहीं पड़ता और यह हजारो सालो तक सुरक्षित रहता है । 


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